बरसात के उ रात बस एगो सपना बन के रह गइल बा, अभीए अभीए हम ऑफिस से घरे पहुचल रहनी तबे एगो काल आइल | ई अइसन काल रहे जौना के हम चाह के भी अवोआएद ना कर सकत रहनी | हम ऑफिस के ही ड्रेस में आपन बाइक निकलनी आ चल देहनी | उ रात में बारीस कहत रहे की हम आज छोड़ के काल न बरसम | खैर केहुन्गा बारीस में भींगते भान्गते हम उहाँ पहुच गईनी | रात के ग्यारह बजत रहे, सड़क सुनसान भइल रहे आ उन्हवे बिल्डिंग के निचे एगो कोना से हल्का सा सिसकी के आवाज़ आवत रहे |
हम चुपके से जाके बगल में बईठ गईनी | करीब दस मिनट बाद सिसकी थोडा कम भईल, सर हल्का से उपर उठल | हमरा कुछ कहे से पहीले ही आवाज़ आइल, “रउवा कब अइनी हाँ?” हम कहनी बस थोड़े देर पहीले | फिर कुछ देर खातिर सन्नाटा छा गइल | थोड़े देर में हमही शुरू कईनी बात, थोडा बहुत आपन ऑफिस के बात करे लगनी | हमार मकसद उ माहौल के थोडा सा हसनुमा बनावे के रहे | कुछ देर में हम कामयाब भी हो गईनी | जब हमरा सबकुछ ठीक लागेलागल त हम घरे खातिर निकले लगनी |
रात के बारह बजत रहे आ बरखा भी थोडा कम हो गईल रहे | हम जईसे आपन बाइक स्टार्ट कईनी हमरा थोडा ठंढा लागल, तब हमरा भुझाइल की हम एक घंटा से पूरा भिजले बैठल रहनी | हमार कपडा, चमड़ा के जूता आ ईंहा तक की अंदर के सारा कपडा भी भीज गईल रहे | हम जल्दी जल्दी घरे अइनी, कपड़ा बदलनी | थोडा गरम पानी से देह पोंछनी | रात भी काफी हो गईल रहे त थोडा सा कुछो खा के सुते चल दनी |
बिस्तर पे चल त गईनी लेकिन हमरा नींद ना आवतरहे | हम सोचे लगनी की हम एतना सबकुछ कईसे क देनी हां, हम एक घंटा से ज्यादा भीजल रहनी लेकिन हमरा कुछो पता ना चलल |